Struggle for land will not end

Opinion
Struggle for land
Pic courtsey:agriculturesnetwork.org

किसानों का जमीन के साथ सदियों से गहरा रि’ता रहा है। किसानों के लिए जमीन जिंदगी है। उनका जीवनयापन जमीन पर ही निर्भर होता है। यही वजह है कि किसान किसी भी कीमत पर अपनी जमीन छोड़ना नहीं चाहते। चाहे इसके लिए उन्हें जान ही गवानी क्यों न पड़े। दूसरी तरफ वै’िवक अर्थ व्यवस्था के इस दौर में जमीन अत्याधिक महत्वपूर्ण संपत्ति बन चुकी है। इसके कारण आज जमीन संघर्ष का कारण बनती जा रही है।

बे’ाुमार पूंजी और वै’िवक अर्थव्यवस्था को अपनी जरूरतों और अनेक प्रकार की गतिविधियों के लिए जमीन की आव’यकता है। चाहे बड़े-बड़े पाॅवर प्लांट स्थापित करना हो, उद्योग लगाना हो, खदान चलाना हो या फिर मल्टीने’ानल कंपनियां स्थापित करनी हो।

इन सबके लिए जमीन की ही जरूरत पड़ती है। नतीजतन दे’ा भर में कारपोरेट घरानों द्वारा जमीन पर कब्जा जमाने का एक सिलसिला शुरू हो गया है। इसके साथ ही दे’ा भर में भूमि पर कब्जा करने वाले पंूजीपतियों और ग्रामीण किसानों के बीच संघर्ष तेज हो गया है। हद तो यह है कि अब ग्रामीण किसानों के हितों की लड़ाई लड़ने वालों को झूठे और फर्जी मामलों में फंसाया जा रहा है और जेलों में कैद किया जा रहा है। भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के खिलाफ आंदोलन करने वालों को तो अब छोटे-छोटे मामलों में भी लंबे समय तक जेलों में रातें गुजारनी पड़ रही हैं। इसके उदाहरण मध्य प्रदे’ा में किसानों की लड़ाई लड़ने वाले जनवादी राजनीतिज्ञ डाॅ. सुनीलम और झारखंड में जबरन भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के खिलाफ आंदोलन करने वाली पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता दयामणि बारला हैंं।Struggle for land

उल्लेखनीय है कि 1998 में मध्य प्रदे’ा के बैतूल जिले के मुलताई गांव में किसान बर्बाद हुई फसल के बदले मुआवेजे की मांग कर रहे थे। वे तहसिल का घेराव करना चाहते थे। इसी दौरान पुलिस ने उनपर फायरिंग की। इस घटना में 24 किसान मारे गए और 150 घायल हो गए। इस मामले में उल्टे पुलिस ने 250 किसानों के विरूद्ध मुकदमें भी किए। साथ ही किसानों के हित में आंदोलन करने वाले डाॅ सुनीलम को भी एक फर्जी मामले में फंसाया गया और मुकदमा चलाया गया। हाल ही में डाॅ. सुनीलम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। पिछले दिनों डाॅ सुनीलम की रिहाई की मांग करने वाली मेघा पाटेकर को भे जेल जाना पड़ा। इतना ही नहीं डाॅ सुनीलम का केस देखेने वाली आराधना भार्गव भी जेल का रास्ता देखना पड़ा।

Struggle for land
Representational Pic

झारखंड की आयरन लेडी दयामणि विगत एक माह से सलाखों के पीछे है। वह विस्थापन के खिलाफ आंदोलन करने की आरोपी हैं। उन्होंने एक पुराने मामले में 16 अक्तूबर को कोर्ट में सेरेंडर किया था। अब एक माह का समय पूरा होने वाला है, लेकिन उन्हें जमानत नहीं मिली। बल्कि उनके खिलाफ नए-नए मामले निकलने लगे। सभी मामलों में लगभग एक ही तरह के आरोप हैं। विस्थापन और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व करना। गौरतलब है कि नगड़ी रांची में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ वर्षों से ग्रामीण किसान आंदोलनरत हैं।

सरकार नगड़ी में भारतीय प्रबंधन संस्थान और विधि वि’वविद्यालय की स्थापना करना चाहती है। इसके लिए सरकार को नगड़ी में जमीन चाहिए। सरकार नगड़ी में किसानों की जमीन जबरन अधिग्रहित करना चाहती है। न्यायालय का मानना है कि नगड़ी में जमीन का अधिग्रहण पूर्व में हो चुका है। अब वहां के लोग बेवजह अड़ंगा लगा रहे हैं। इसलिए नगड़ी में प्रस्तावित योजनाएं जमीन पर जल्दी ही उतर जानी चाहिए। लेकिन ग्रामीणों का मानना है कि जमीन का अधिग्रहण नहीं हुआ है। सरकार उनकी जमीन जबरन लेना चाहती है। वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन देना नहीं चाहते। इसी बात को लेकर वहां आंदोलन चल रहा है। दयामणि पर आरोप है कि वह ग्रामीणों के साथ अधिग्रहण वाली जमीन पर ग्रामीणों के साथ पहुंची और खेतीबारी की। अब एक और मामले में दयामणि को न्यायालय का अवमानना करने की नोटिस भेजी गई है।

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