Satnam was brutally murdered in judicial custody

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Satnam Singh Mannएक खुबसूरत दोस्त एवं दार्शनिक व्यक्ति,सतनाम सिंह मन का एक निश्छल सा ख्वाब था, इस दुनिया को बदलने का, अपनी पाक आत्मा लिए यह नौजवान अभी आगे बढ़ा भी ना था.. कि जीवन ने इसका साथ छोड़ दिया.. इसकी हत्या कर दी गयी.. 
केरल के न्यायिक हिरासत में, एक नौजवान का खून हों जाना, लोकतंत्र के मुह पर तमाचा है.. हमारा देश जहां हर व्यक्ति को जीवन का अधिकार है.. वहीँ एक नौजवान से उसका ये हक़.. न्यायिक हिरासत में छीन  लिया गया.. 
२३ वर्षीय, सतनाम सिंह मन, जिला शेरघाटी, गया, बिहार का निवासी था और डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय का छात्र था. 
उसकी छुपी  प्रतिभा का ज्ञान तब तक नहीं पता चलता था जब तक वह बातें ना करना शुरू करे, बेहद साधारण दिखने वाला यह व्यक्ति, ना ही केवल समाज में बल्कि अपने आप में भी एक बहुत बड़ा परिवर्तन लाना चाहता था..  
उसकी सबसे  महत्त्वपूर्ण आकांक्षा, भारत  में साधारण  व्यक्तियों  को दी गयी प्रदत्त अधिकारों को बदलने कि थी .. लेकिन  उस  नादाँ को यह ज्ञान नहीं था, कि हमारा संविधान तो केवल किताबो तक सीमित  है.. असल जीवन में तो  उसे  अभी लाया ही नहीं गया है.. शायद, दुनिया की कठोर वास्तविकताओं और इन समस्याओं का समाधान इस प्रकार विपरीत था कि उसे मानसिक रूप से अयोग्य घोषित कर दिया गया…
सतनाम, किसी भी मानसिक रूप से अयोग्य व्यक्ति कि तरह केवल करुणा, प्रेम और उपचार का हकदार था किन्तु उसे एक ऐसे अपराध कि सजा न्यायिक हिरासत में पीट पीट के मिली, जो उसने कभी की ही नहीं थी.. उसकी हत्या की गयी.. उस बेक़सूर, निर्दोष को एक मौका भी ना दिया गया कुछ बोलने को..  सतनाम को हत्या करने के प्रयास के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था, जबकि उसके पास से ऐसे कोई हथियार नहीं  बरामद हुए थे.. उसने कोई जुर्म नहीं किया था.. केवल एक शक की सुई पर उससे उसके जीवन का अधिकार भी छीन लिया गया.. भारत के उच्चतम पुस्तक, संविधान में स्पष्ट शब्दों में एक व्यक्ति को सुने जाने का हक दिया गया है.. केरल की पुलिस ने ना ही केवल संविधान का उल्लंघन किया है बल्कि एक बेक़सूर व्यक्ति से उसके जीवन छीना है, एक परिवार से उसका बेटा छीना है…
सिर्फ एक मिनट के लिए रुक कर, उस माँ के दर्द को समझे और विचार करे जिसके जवान बेटे की जो कि मानसिक रूप से अयोग्य था, गरम लोहे की छड़ों से, केबल के तारों से मार मार कर हत्या कर दी गयी (पोस्ट मोर्टेम रिपोर्ट के अनुसार: उसके शरीस पे ७७ चोट के निशाँ पाए गए), एक ऐसे गुनाह के लिए जो उसने कभी किया ही नहीं.. जो साबित हुआ ही नहीं.. जिससे बोलने का मौका नहीं दिया गया..
घर से गुमशुदा, सतनाम, के बारे में पुलिस को जानकारी ३० मई २०१२ को दी गयी थी.. उसे २ महीने तक खोजने में असफल पुलिस ने मात्र ४ दिनों में ही उसे दोषी मान कर उसकी हत्या कर दी.. सतनाम को मृत घोषित १ अगस्त  २०१२ को किया गया था.
हमारे कानून व्यवस्था को क्या होता जा रहा है? क्या वास्तव में हमारे देश में कोई कानून है ही नहीं? अगर है, तो सब नज़रे क्यों फेरे हैं? कोई कुछ बोलता क्यों नहीं? शर्म है इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र देश पे, जहाँ राम ही रावण बन चुका हैं.. जहा हमारे रक्षक ही भक्षक बन चुके है.. वही रक्षक जो हमें बचाने की शपथ लेते है.. आज निर्दोषों की जान ले रहे है..
क्या आज एक आम नागरिक को न्याय मिलना एक बेहद दूर सपने जैसा है???
क्या आज के युग में कोई इंसानियत के खातिर आगे नहीं आएगा??
क्या आज सच्चाई का कोई मोल नहीं??
कुछ देर रुक सोचे, विचार करे, और आपको जवाब मिल जाएगा.. 
आइये हम सब मिल कर.. अब इस पर रोक लगाये.. 
इससे पहले कि बहुत देर हो जाए.. और एक और सतनाम मारा जाये.. 

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