On the Teachers'day,Governor Ahmad louds teachers

Press Release

Sayed Ahmad

दिनांक 5 सितम्बर 2012 को राजभवन में संध्या 5 बजे ”शिक्षक दिवस के अवसर पर राजभवन में आयोजित कार्यक्रम में महामहिम के अभिभाषण हेतु विचारणीय बिन्दु :-

• मुझे ”शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में समिमलित होकर हार्दिक प्रसन्नता हो रही है।
• सर्वप्रथम ”शिक्षक दिवस के इस अवसर पर आप समस्त शिक्षक को हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधार्इ देता हूँ।
• हम महान शिक्षाविद भारतरत्न डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णान के जयंती को शिक्षक दिवस के रुप में मनाते है, जिनका सपना था कि देश में सबसे तेज बुद्धि वाले लोग शिक्षक होने चाहिये। इसलिए शिक्षक दिवस हम सभी, छात्रों और यहाँ तक कि अभिभावकों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि सभी शिक्षक राष्ट्र के लिए बुनियाद रखने का का काम करते हैं। इस अवसर पर मुझे अपने वे सभी शिक्षक बेहद याद आ रहे हैं, जिनके आशीर्वाद और मार्गनिदेषन से मैं यहाँ तक पहुँचा हूँ।
• आज ही के दिन 5 सितम्बर 1888 को हमारे देश के द्वितीय राष्ट्रपति एवं प्रथम उपराष्ट्रपति भारतरत्न डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म चेन्नर्इ के निकट तिरूतनी शहर में हुआ था। डा0 कृष्णन एक महान दार्षनिक और उच्च कोटि के राजनेता थे। उन्होंने अपने दर्षन में पूर्वी और पश्चमी सभ्यता के अच्छे गुणों के समावेश पर चिंतन प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने चिंतन में पश्चमी  विचारधारा के अच्छे गुणों को भारतीय दर्षन में प्रस्तुत किया। सन 1952 में भारत के उपराष्ट्रपति बने एवं सन 1962 में राष्ट्रपति बने।
• इस महान दार्षनिक की प्राथमिक शिक्षा गोवांडी स्कूल, तिरूबेल्यू में हुआ और उच्च विधालय की शिक्षा पी0एम0 हार्इ स्कूल, रेनुगंटा में हुर्इ । उन्होंने मद्रास विश्विविद्यालय से कला संकाय में स्नातक और स्नातोकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। सन 1921 में वे कलकत्ता विश्विविद्यालय  में भारत के सबसे महत्वपूर्ण दर्षनषास्त्र के संस्थान (चेयर) ”द किंग जार्ज वी चेयर आफ मेन्टल एण्ड मोरल सार्इन्स में प्राध्यापक के रूप में नियुक्त किये गये।
• डा0 राधाकृष्णन सन 1926 में कोलकाता विश्विविद्यालय  की ओर से कांग्रेस आफ दी युनिवर्सिटी में प्रतिनिधित्व किये और सन 1929 में हावार्ड यूनिवर्सिटी में इन्टर नेशनल कांग्रेस आफ फिलोसफी में प्रतिनिधित्व किये।
• सन 1931 में आंध्र विश्विविद्यालय  के कुलपति बने। इस महान ‘शिक्षाविद का मत था कि उचित शिक्षा से ही समाज में मौजूद समस्याओं का समाधान हो सकता है। वे शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन के पक्षधर थे। उनका मत था कि हमें अपने शिक्षा की गुणवता  पर विषेष ध्यान देने की जरूरत है, इसमें सुधार की आवष्यकता है। शिक्षा और छात्रों के विषय में उनका विचार था कि छात्रों को अपनी शिक्षा में उच्च नैतिक मूल्यों को भी शामिल करना चाहिए। एक बेहतर शिक्षक कैसा होता है, इसकी मिसाल डा0 राधाकृष्णन है।
• वे जिस विषय को पढ़ाते थे, उसे पढ़ाने के पहले खुद उसका अच्छी तरह अध्ययन करते थे। उनका कहना था कि शिक्षक उन्हीं लोगों को बनाया जाय चाहिए, जो सबसे अधिक बुद्धिमान हो।
• शिक्षक को सिर्फ अच्छी तरह अध्यापन करके हर संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए, उसे अपने छात्रों का स्नेह और आदर हासिल करना चाहिए। सम्मान शिक्षक भर होने से नहीं मिलता, उसे अर्जित करना पड़ता है।
• शिक्षक का काम है ज्ञान को एकत्र करना या प्राप्त करना और फिर उसे बांटना। उसे ज्ञान का दीपक बनकर चारों तरफ अपना प्रकाश  फैलाना चाहिये, उनके ज्ञान की गंगा हमेसा  बढ़ती रहनी चाहिये।
• मेरा मानना है कि मात्र जानकारियां देना ही शिक्षा नहीं है। हलांकि, जानकारी का अपना महत्व है और आधुनिक युग में तकनीक की जानकारी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन व्यकित के बौद्धिक झुकाव और उसकी लोकतांत्रिक भावना का भी काफी महत्व है। ये बातें व्यकित को एक उत्तरदाई नागरिक बनाती हैं।
• शिक्षा का लक्ष्य ही है- ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरंतर सीखते रहने की प्रवृति है । यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो व्यकित को ज्ञान और कौशल दोनों प्रदान करती है। एक कुशल शिक्षक इन कार्यों में छात्रों को मदद करने का काम करता है।
• भ्रष्टाचार मुक्त और सुन्दर-मन वाले लोगों का देश बनाना है, तो समाज के तीन प्रमुख सदस्य माता, पिता और गुरू को अपनी भूमिका पूर्ण निर्वाह करना होगा।
• महान दार्षनिक अरस्तू ने कहा है कि जन्म देने वालों से अच्छी शिक्षा देने वालों को अधिक सम्मान दिया जाना चाहिए क्योंकि जन्म देने वाले ने तो बस जन्म दिया है, पर शिक्षक ने जीना सिखाया है।
• आप तमाम गुरुजनों से राज्य एवं राष्ट्र को काफी आकांक्षाएँ हैं । आप ही व्यकित के अन्दर मौजूद दुर्गणों  व बुरे विचारों को निमर्ूल कर अथवा दूर कर न सिर्फ उसे योग्य व्यकित बनाते हैं, बलिक समाज एवं राष्ट्र को भी प्रकाषमान करते हैं। आपा राष्ट्रनिर्माण के महान सारथि है।
• जैसा कि आप सभी जानते हैं कि शिक्षा के बिना किसी भी राष्ट्र का विकास संभव नहीं है । शिक्षा किसी भी राष्ट्र के विकास की कुंजी होती है और आप सब राष्ट्र के विकास में अहम भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं , आप ही के कंधों पर विधार्थियों को आत्मनिर्भर बनाने एवं उन्हें आत्मबल प्रदान करने का दायित्व है, ताकि वे समाज एवं देष की सेवा निष्ठा एवं समर्पण से कर सकें। आप शिक्षक समुदाय ने इस राष्ट्र को सभी क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा से सुषोभित करनेवाले वैज्ञानिक, अभियंता, चिकित्सक, आर्इएएस, आर्इपीएस जैसे अधिकारियों के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है, आपके असली सम्मान ये गौरवमयी छात्र ही हैं।
• वास्तव में शिक्षा से जुड़े हुए व्यकित का असली सम्मान तब बढ़ता है, होता है जब कोर्इ विधार्थी यह कहता है, महसूस करता है कि उसकी सफलता के पीछे अमूक शिक्षक का विषेष हाथ है।
• आप सभी जानते हैं कि किसी भी राष्ट्र का निर्माण उसकी कक्षाओं में ही होता है, उसकी प्रगति एवं उसके चारित्रिक विकास का स्तर उसके नागरिकों के व्यकितत्व पर निर्भर करता है और नागरिकों का निमार्ण का स्वरूप शैक्षिक पर्यावरण एवं उसकी शिक्षा नीति के साथ जुड़ा रहता है।
• शिक्षा के द्वारा ही व्यकित के व्यकितत्व का विकास होता है, उसका उद्धार होता है, उसका सांस्कृतिक नवीनीकरण होता है, उसमें राष्ट्रीय एकता का भावना का विकास होता है, उसकी आर्थिक प्रगति होती है तथा विधार्थियों को समाज की विभिन्न आवष्यकताओं की पूर्ती हेतु प्रशिक्षण मिलता है।
• शिक्षित समुदाय ही पथ-प्रदर्षक होता है। किसी भी समाज का नेतृत्व करने के लिए उच्चतर मूल्यों का निर्वाह करना आवष्यक है, जो शिक्षा से ही संभव है।
• हमारे विधार्थियों को गुणवतायुक्त शिक्षा सुलभ हो, इस हेतु समय-समय पर राजभवन में मैं विष्वविधालयों की से कुलपति व पदाधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक करता हूँ।
• समीक्षा बैठक में मैंने अनुभव किया कि विष्वविधालय के शिक्षकों एवं कर्मचारियों को विलंब से उन्हें सेवानिवृतीलाभ मिलने के कारण वे अपने आप को असुरक्षित महसूस करते हैं, इस हेतु मैंने राज्य के सभी विष्वविधालयों को जल्द-स-जल्द उनके सेवानिवृती लाभ को उन्हें प्रदान करने का निदेष दिया है। जैसा कि आप सभी जानते होंगे कि विष्वविधालयों के शिक्षकों व कर्मियों से जुड़े लंबित वादों के निबटारा हेतु लोक आदालत का भी आयोजन किया गया।
• मैं नहीं चाहता कि हमारे कोर्इ भी शिक्षक किसी भी प्रकार से अपने- आपको असुरक्षित महसूस करें क्योंकि हमारे शिक्षक हमारे गौरव है। यूँ कहें कि हमारे समाज का सबसे बड़ा सेवक शिक्षक ही है।
• मुझे उम्मीद है कि हमारे शिक्षक अपने दायित्वों व कर्तव्यों का सदैव निर्वहन करते रहेंगे एवं शिक्षा की उस अलख को जलाये रखेंगे, जिसके प्रकाश  से से पूरी दुनिया देश  रौशनमय हो।
• एक बार पुन: मैं आप समस्त शिक्षकगणों को शिक्षक दिवस के अवसर पर हार्दिक बधार्इ देता हूँ और आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।

जय हिन्द ! जय झारखण्ड!

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