'Maintain communal harmony'

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देश के दो भार्इ जो हमेशा से कांधे से कांधा मिलाकर रहते आए हैं , 612 के दिन उन्हें एक दूसरे के आमने-सामने कर दिया गया था । भय और आतंक के माहौल में उस दिन सिर्फ दो ही आवाज सुनार्इ दे रही थी । एक हिन्दु की आवाज थी और दूसरी मुसलमानों की आवाज । एक भार्इ कह रहा था हमारी मसिजद शहीद कर दी गयी और दूसरा भार्इ कह रहा था यह रामचंद्रजी का जन्म स्थान है इसलिए जहां मंदिर बनना चाहिए वहां मसिजद कैसे रहेगी ?

उस दिन जो आवाज नहीं सुनार्इ दे रही थी वह थी भारत की आवाज । भार्इ-भार्इ लड़ रहे थे और मां दर्द से चीख रही थी, मगर मादरे हिन्दुस्तान या भारतमाता की चीख को सुनने वाला कोर्इ नहीं था । 612 की विभिशिका के 20 वर्ष बाद आज उसी दबी हुर्इ आवाज यानी भारत की आवाज को सामने लाने की जरूरत है ।
”मैं भारत हूँ ,मेरे बच्चों मेरी आवाज सुनो-”मंदिर मसिजद का विवाद यहाँ है तो अवश्य मगर यह छोटी चीज है जबकि उसकी अपेक्षा हमारे लिए बहुत ज्यादा महत्व का विषय यह है कि 612 की घटना के दौरान हिन्दू मुसलमान दोनो की माँ यानी भारत की संवैधानिक मर्यादा और संवैधानिक ढ़ांचे को हथियारों से मार मार के लहूलहान कर दिया गया । उस दिन भावनाओं का तूफान हमारी व्यवस्था से सीधे टकरा रहा था । भावनाओं के थपेडे से पूरा संवैधानिक ढांचा हिल रहा था ।

जय श्री राम के नारों की गूंज मे किसी को इतना भी होश नहीं था कि 612 के दिन मसिजद की रक्षा के लिए पार्लियामेंट और सुप्रिमकोर्ट दोनों बड़े संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा दांव पर लगी हुर्इ थी। कौन नहीं जानता कि यह दोनों संवैधानिक संस्थाएं देश की व्यवस्था के सबसे कदआवर सम्मानजनक महान स्तंभ है । हम इन्हें संवैधानिक व्यवस्था का जोडवां टावर (Twin Tower) भी कह सकते हैं । मगर काले इतिहास के उस अंधेरे दिन में मसिजद पर पड़ने वाली हर चोट से उत्पन्न होने वाले कम्पन की वजह कर उन दोनों की बुनियादों में आसाधारण तीव्रता के भटके महसूस किये जा रहे थे । अनियंत्रित भीड़ की आतंकी आंधी में कानून हथियार डाल रहा था और कानून के दो बड़े रखवाले मजबूर खड़े बेबस तमाशार्इ की तरह यह सब कुछ होते हुए अपनी आखों से देख रहे थे । किसी भी देश के इतिहास मेें इससे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य और क्या हो सकता है ?

कौन नहीं कहेगा कि यह व्यवस्था के फेल हो जाने की अत्यंत गंभीर और घिनावनी घटना थी । किसी भी देश में व्यवस्था का फेल हो जाना वैसा ही होता है जैसे शरीर में हार्ट का फेल हो जाना।

612 के इस मनहूस दिन में अराजकता के युग का शिलान्यास हो गया । अफरातफरी के दिन के आरंभ से लेकर आजतक हर स्तर पर कानून व्यवस्था के डांवाडोल होने का जो सिलसिला जारी है वह बताने का मोहताज़ नहीं । पार्लियामेंट अधिकार एवं प्रतिष्ठा की दृषिट से देश की उच्च्तम संवैधानिक संस्था है । मगर दुर्भाग्यवश 612 के बाद हुए आम चुनाव में अंधे भावनाओं का जुनून उम्मीदवारों की खूबियों पर हावी रहा , परिणामस्वरूप सड़क कलचर वाला हुडदंगियों का वही हूजूम पारर्लियामेंट में प्रवेश करने में सफल हो गया । पार्लियामेंट जिसे डेमोक्रेसी का मंदिर कहा जाता है उस दृषिट से उस पवित्र मंदिर के देवाताओं की कारगुजारी पर कुछ न कहा जाए तो अच्छा है । हमारा पार्लियामेंट जहां देश के हर महत्वपूर्ण नीति के निर्णय लिये जाते हैं उस उच्च्तम प्रतिष्ठा वाले संस्थान में अराजकता का यह हाल कि उठा पटक, हो हल्ला आए दिन का मामूल बन गया है । जब दस्तूर साजी ही चरमरा रही हो तो बाकी विभागों का क्या हाल होगा अंदाजा लगाया जा सकता है । कुछ लोगों को शायद अभी भी याद हो पहले जमाने में जब कोर्इ सदस्य सदन के काम में व्यधान डालता था तो स्पीकर के आदेश से उसे मार्शल द्वारा उठवाकर बाहर कर दिया जाता था। लोग पूछ सकते हैं कि विधि विधान की खातिर अब ऐसा क्यों नहीं किया जाता है । अरे भार्इ ! जब से यह बीजेपी देश की बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी है डेमोक्रेसी के मंदिर में देवाताओं के स्थान पर हुड़दंगियों की टोली विराजमान हो गर्इ है । ऐसे में बेचारे मार्शलगण स्वयं अपनी मर्यादा का बचाव करले तो वहीं बहुत है । कहते हैं कि नफीस कपड़े में छोटा मोटा सुराख या एक्का दुक्का खराेंच हो तो उसका रफ्फू के द्वारा मरम्म्त किया जा सकता है मगर यहां तो पूरा का पूरा थान जल मग्न हो कर सड़ चुका है । अत: 612 में किसकी हार हुर्इ और किसकी जीत हुर्इ यह तो फैसला होना है, मगर यह बात बिल्कुल अटल सत्य है कि इसमें भारत की पराजय हुर्इ है । इसके होते हुए भी इसे जो विजय दिवस कहता है न भारत उसका हो सकता है और न वह भारत का हो सकता है । अब देश कैसे चलेगा यह तो भगवान जाने ! संवैधानिक मर्यादाओं को भंग करने का यह आलम है कि उस घटना के बाद से जब भी संप्रदायिक शकितयां मैदान में आगे आती है तो कानून मैदान छोड़कर पीछे चला जाता है । अब और क्या कहा जाए, अबतक जिस देश को स्वयं सुपर पावर बन जाना चाहिए था वह आज सुपर पावर के पैर छुने में गौरव का अनुभव करता है यानी जहां गौरत होनी चाहिए थी वहां फख्र किया जा रहा है ।

बाबरी मसिजद विध्वंस के इस ऐतिहासिक त्रास्दी के दिन अंधे आवेश की र्इंधन से उड़ान भरने वाले जहाज देश की व्यवस्था के बड़े टावर से बार-बार टकरा रहे थे अब इसमें दो मत नहींं कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में 612 की घटना संवैधानिक व्यवस्था पर होने वाला सबसे बड़ा आतंकी हमला के रूप में याद की जाएगी ।

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