एक वर्ग को खुश करने में कहीं एक वर्ग को नाराज तो नही कर रही है झा मु मो

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रांची : पांच राज्यो के नतीजे सामने है, भाजपा सहित देश की तमाम पार्टियों के लिए इसमें एक सीख निहित है, एक वर्ग विशेष को खुश करके आप चुनाव जीत ही नही सकते है, आज देश मे कोई ऐसा वर्ग नही है जो अपने दम पर किसी पार्टी को कोई भी चुनाव जितवा दे, ना ही ये स्थिति लोकतंत्र के लिए लाभदायी है, लोकतंत्र में सबको साथ लेकर ही आप आगे बढ़ सकते है और विकास का पैमाना भी तय कर सकते है, तुष्टीकरण की राजनीति से हर राजनीतिक दल को बचना चाहिए क्योंकि किसी एक वर्ग को खुश कर के भी आप उसका शत प्रतिशत वोट ले नही सकते और इसका खामियाजा आपको विरोधी वोट के एकजुट होने से भुगतना पड़ सकता है, झारखंड में आदिवासी 26 से 28 प्रतिशत है ,जिसके दम पर झा मु मो अपनी नैया पार लगाने की सोच रहा है,लेकिन 100 % आदिवासी झा मु मो के साथ भी नही है ,इसका साफ मतलब है कि आपको तथाकथित बाहरी लोगों का सहयोग भी चाहिए सरकार बनाने के लिए, बाहरी बनाकर हेमंत सोरेन खुद अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी नही मारना चाहेंगे, पिछले विधानसभा चुनाव के वोट को विश्लेषण करने पर आप स्वतः ही ये जान पाएंगे कि कई सीटो पर स्वर्ण वोट ना मिलने के कारण ही झा मु मो नही जीत पाई , आज झा मु मो में अगड़ी जाती के नेताओ की किल्लत है, जो वोटरों को लुभा कर लामबंद कर पाएं, सिल्ली और गोमिया उपचुनाव में भी कांग्रेस के ब्राह्मण नेताओ को गोमिया में उतार कर ही झा मु मो ये सीट बचा पाई, भाजपा के अंदरूनी कलह, कार्यकर्ताओ की नजरअंदाजी, महंगाई और बेरोजगारी ने सत्ता विरोधी लहर तो बनाया है लेकिन वाकई हेमंत और टीम इस लहर को अपने फायदे में इस्तेमाल कर पाएंगे, मौजूदा हालात तो इस और इशारा कर रही है कि झा मु मो को जल्द ही अपनी नीति में बदलाव कर पूरे राज्य वाशियो को साथ लेकर चलने की जरूरत है और यही बदलाव ,राज्य में सत्ता बदल सकती है।

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