Lalu out to delay justice,says Roy

Politics

Sarayu Roy today held press conference in Ranchi saying RJD chief Lalu Prasad Yadav,who is accused in five cases of the multi million rupee fodder scam,is desperately trying to delay the judicial process and judgement.

In the RC-20/96 case.CBI court’s Judge PK Singh has fixed July 15 to make public the verdict.Lalu who is one of the prime accused in this case,had moved the Jharkhand High Court alleging that he had no faith on this judge on the ground,he had claimed,that Singh was a relative belonging to  his political rival party JD(U).

While the Jharkhand High Court is slated to hear his case tomorrow,Roy,EX BJP MLA,held the press conferance in Ranchi.

We are carrying out the press release issued by Roy in Hindi in public interest.

The press release said as follows:

11 मार्च 1996 को हमारी जनहित याचिका संख्या-161796 में पटना उच्च न्यायालय ने पशुपालन घोटाले की जांच सीबीआर्इ से कराने का निर्देश दिया था, जिसे उच्चतम न्यायालय ने 18 मार्च 1996 को सम्पुष्ट किया।

उक्त फैसले के कतिपय प्रासंगिक अंश निम्नांकित हैं :-
But from what has been seen above, it is clear that the excess drawals were not isolated acts; they were manifestations and result of well-knit conspiracy to commit loot and plunder of public money in a systematic manner, which could not be possible without the support of high-ups. The incidence has been more in the districts of Ranchi, West Chaibasa, East Chaibasa, Gumla, Lohardaga, Dumka, Godda, Sahibganj, Hazaribagh.

अपने फैसला के अंतिम पाराग्राफ में माननीय पटना उच्च न्यायालय की निम्नांकित टिप्पणी इस संदर्भ में
विशेष रूप से प्रासंगिक है :-

The directions as given hereinabove should also not be understood as ‘indictment’ of any individual or individuals; they are intended merely to serve public interest and keep the people faith in the system intact. For, if that faith is shaken, the whole edifice will fall. The values of public life are fast declining. I do not expect that this judgement and the CBI investigation will improve the system. But, if we are only able to maintain it, by our effort, we well feel gratified.

उच्चतम न्यायालय ने घोटाले के मुख्य अभियुक्त श्री लालू प्रसाद के निवेदन पर निर्देश दिया कि सीबीआर्इ
जांच की मोनिटरिंग पटना उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ करेगी। पटना उच्च न्यायालय की देखरेख में जांच के
उपरांत सीबीआर्इ ने कुल 64 मुकदमों में चार्जशीट दायर किया। झारखंड राज्य अलग होने के बाद उच्चतम
न्यायालय के निर्देश पर 64 में से 55 मुकदमे झारखंड क्षेत्र में स्थानांतरित हो गए। इनमें से 2 मुकदमे सीबीआर्इ ने
बन्द कर दिया। शेष 53 मुकदमे में से 45 मुकदमों मे सीबीआर्इ के विशेष न्यायालय ने अपना फैसला सुना दिया
है। करीब 900 अभियुक्तों को 2 वर्ष से 7 वर्ष तक कारावास की सजा और 10 लाख रुपये तक का अर्थदंड हो चुका
है। हाल ही में पूर्व सांसद डा. आर.के. राणा और पूर्व विधायक श्री ध्रुव भगत को 5 वर्ष तक का कारावास और 5
लाख रुपये से उपर के अर्थदंड की सजा हो चुकी है।

शेष 8 मुकदमों में सीबीआर्इ के विभिन्न विशेष न्यायालयों में सुनवार्इ चल रही है। इसमें से 5 मुकदमों में श्री लालू प्रसाद अभियुक्त हैं। इन्हीं मे से एक मुकदमा त्ब्2096 भी है। न्यायालय के निर्देशानुसार जांचोपरांत सीबीआर्इ ने सबसे पहले इसी मुकदमे में चार्जशीट दाखिल किया था। परंतु आज तक इस मुकदमे में सुनवार्इ और बहस ही चल रही है। श्री लालू प्रसाद इस मुकदमे में न्याय की प्रक्रिया को एक सोची-समझी साजिश के तहत बिलमिबत कर रहे हैं। इसके लिए वे अप्रावधानों का दुरुपयोग कर रहे हैं, जिनके आधार पर भारतीय दंड संहिता में किसी अभियुक्त को अपना बचाव करने का वाजिब अवसर दिया गया है। जब से डा. आर.के. राणा और श्री ध्रुव भगत को सजा हुर्इ है, तब से श्री प्रसाद विचलित हो गए हैं और कोशिश कर रहे हैं कि त्ब्2096
के फैसले में जितना विलम्ब कराया जा सके, उतना कराया जाए। दो दिन पूर्व इस मामले में श्री प्रसाद ने  पुन: झारखंड उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और सीबीआर्इ के संबंधित विशेष न्यायालय के न्यायधीश की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा किया। वे चाहते हैं कि उनका मुकदमा दूसरे न्यायालय में स्थानांतरित हो जाए, ताकि
मुकदमे की सुनवार्इ नये सिरे से हो और फैसला आने में साल-दो साल की देरी हो जाए।
आश्चर्य है कि विगत दो वर्ष से इसी न्यायालय में त्ब्2096 मुकदमे की सुनवार्इ हो रही है। श्री लालू
प्रसाद के करीब 3 दर्जन गवाहों ने गवाही दिया है। स्वयं दो दिनों तक श्री लालू प्रसाद से इसी न्यायालय में
सीबीआर्इ के अधिवक्ता ने जिरह किया है। अब जब माननीय न्यायधीश ने 15 जुलार्इ 2013 को त्ब्2096 में
फैसला देने की तिथि निर्धारित कर दी है और श्री लालू प्रसाद सहित तमाम अभियुक्तों को उस दिन न्यायालय में
हाजिर होने का निर्देश दिया है, तब श्री प्रसाद को यह तर्क सुझा है कि संबंधित न्यायधीश बिहार के जदयू के एक
नेता के रिश्तेदार हैं। श्री लालू प्रसाद यह भूल जाते हैं कि जिस पटना ला कालेज के श्री लालू प्रसाद विधार्थी रहे
हैं, उसी पटना ला कालेज से संबंधित न्यायधीश ने भी उनसे जूनियर क्लास में कानून की पढ़ार्इ की है। वे एक
यह तथ्य दूसरे को पहले से जानते हैं इस मुकदमे में श्री लालू प्रसाद की जिरह के दौरान सामने आया था।
यह पहला अवसर नहीं है जब श्री लालू प्रसाद त्ब्2096 के फैसले में देरी के लिए सुनियोजित साजिश
कर रहे हैं। इसके पहले भी वे 4 बार इस मुकदमे की सुनवार्इ में देरी करने की सफल-असफल कोशिश में उच्च
न्यायालय का दरवाजा खटखटा चुके हैं। पहली बार वे सीबीआर्इ के कनीय अधिकारियों डी.एन. विश्वास और विमल
कुमार की गवाही और बहस पूरा हो जाने के बाद फिर से उनका परीक्षण कराने हेतु विशेष न्यायधीश को निर्देश
देने के लिए उच्च न्यायालय गए थे। इस कारण मुकदमों की सुनवार्इ में कुछ विलम्ब हुआ, पर श्री प्रसाद अपनी
साजिश में सफल नहीं हो सके।
दूसरी बार श्री प्रसाद ने अपने सभी 79 गवाहों की गवाही लेने के लिए विशेष न्यायधीश को निर्देश देने हेतु
झारखंड उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल किया। इसमें उन्हें आंशिक सफलता मिली। विशेष न्यायधीश ने उनके
79 में से 15 गवाहों की ही गवाही देने का निर्णय किया था। कारण कि अधिकांश गवाह एक ही प्रकार के थे।
उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप से गवाहों की दोगुनी संख्या की गवाही हुर्इ। जिस कारण सुनवार्इ में काफी विलम्ब
हुआ। स्वयं लालू प्रसाद ने इसमें अपनी लिस्ट के जिरह के लिए 40 दिन से अधिक समय लिया। तीसरी बार श्री
लालू प्रसाद ने सीबीआर्इ के बैंकाक में रहने वाले एक गवाह की गवाही लेने हेतु विशेष न्यायालय को बाध्य करने
की याचिका के साथ झारखंड उच्च न्यायालय में गए। इस बार सीबीआर्इ ने भी उनका पक्ष लिया और बैंकाक जाकर
गवाही देने हेतु कमीशन बनाने का निर्देश उच्च न्यायालय ने दे दिया। इस कारण मुकदमे की सुनवार्इ में पुन: विलम्ब
हुआ।
चौथी बार श्री प्रसाद उस समय झारखंड उच्च न्यायालय में याचिका के साथ गए, जब विशेष न्यायालय
के सामने यह स्थापित हो गया कि सीबीआर्इ के इस गवाह की गवाही लेने या नहीं लेने से मुकदमे की गुणवत्ता
पर कोर्इ असर नहीं पड़ेगा। इस बार उच्च न्यायालय ने श्री प्रसाद की दलील खारिज कर दिया। अब श्री प्रसाद
पांचवी बार झारखंड उच्च न्यायालय में सीबीआर्इ के विशेष न्यायधीश के यहां से मुकदमा के दूसरे कोर्ट में
स्थानांतरित करने के लिए गए हैं। श्री प्रसाद ने विभिन्न तर्कों का सहारा लेकर मुकदमे की सुनवार्इ को बाधित करने
का प्रयास नहीं किया होता तो त्ब्2096 में विगत अप्रैल 2012 में ही फैसला हो चुका होता।
इसी केस में नहीं बलिक पहले भी पटना उच्च न्यायालय में माननीय न्यायधीशों के कोर्ट में मुकदमों को
बाधित करने का और सुनवार्इ में बिलम्ब करने का प्रयास श्री लालू प्रसाद कर चुके हैं। उनके विरुद्ध आय से
अधिक सम्पत्ति के मामले में भी वे एक न्यायधीश श्री योगेन्द्र प्रसाद को हटवाने में सफल हो चुके हैं। इस मुकदमे
में सीबीआर्इ ने श्री लालू प्रसाद के पक्ष में हुए फैसले के विरुद्ध अब तक अपील नहीं किया है। इसी तरह आय से
अधिक सम्पत्ति के मामले में भी श्री प्रसाद मनमोहन सिंह की केन्द्र सरकार को समर्थन देने की एवज में आयकर
विभाग के फैसले को पलटवा चुके हैं। आयकर अधिकारियों ने 1998-99 में पुख्ता सबूत के आधार पर साबित कर
दिया था कि मुख्यमंत्री आवास में चल रहे श्री लालू प्रसाद के खटाल से दिखार्इ गर्इ आय फर्जी है। श्री प्रसाद ने
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आय से अधिक सम्पत्ति साबित हो जाने पर यह तर्क दिया था कि 1972 में उनकी शादी के समय ससुराल से एक
गाय दहेज में मिली थी, जिसका वंश बढ़ते-बढ़ते 100 गायों वाली खटाल बन गया है। आयकर अधिकारियों के
इस सवाल का जबाव श्री प्रसाद नहीं दे पाये कि दहेज में उन्हें जो गाय मिली थी, वह देशी नस्ल की थी तो उसके
बच्चे जर्सी नस्ल के कैसे हो गए। श्री प्रसाद ने इस फैसले के खिलाफ अपील किया। जब वे मनमोहन सिंह सरकार
में रेल मंत्री थे तो उन्होंने दबाव बनाकर दक्षिण भारत के एक ऐसे अधिकारी को पटना में अपील कमीशनर के पद
पर नियुक्त करा दिया, जो 15 दिन बाद रिटायर हो रहा था। रिटायर होने के पहले इस अधिकारी ने सैकड़ों पेंडिंग
अपीलों में से केवल लालू प्रसाद के अपील की ही सुनवार्इ किया और उनके पक्ष में फैसला देकर रिटायर हो गया।
आयकर विभाग ने इस फैसले के खिलाफ कोर्इ कार्रवार्इ नहीं किया।
कानून के प्रावधानों का साजिशपूर्ण उपयोग करने में श्री लालू प्रसाद माहिर हैं। अपनी इसी विशेषता का
दुरुपयोग वे त्ब्2096 में फैसले को प्रभावित करने के लिए कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि यह मुकदमा दूसरे
न्यायालय में स्थानांतरित हो जाए और उनसे संबंधित 5 मुकदमों की सुनवार्इ कर रहे न्यायधीशों का किसी न किसी
तरह स्थानांतरण हो जाए। हाल ही में झारखंड में पदस्थापित उन 22 अतिरिक्त सत्र एवं जिला न्यायधीशों को
उच्चतम न्यायालय ने लमिबत मुकदमे में अंतिम निर्णय आने तक, पदस्थापित करने का निर्देश दिया है, जिनकी सेवा
झारखंड उच्च न्यायालय के एक आदेश के अनुसार समाप्त कर दी गर्इ थी। श्री लालू प्रसाद इन 22 न्यायधीशों की
पदस्थापना के निर्णय का उपयोग एक अवसर के रूप में करना चाह रहे हैं। श्री प्रसाद ने इसी तरह झारखंड
सरकार के दो वरीय पदाधिकारियों को फोन करके उन पर दबाव डाला कि इन 22 जजों की पुन: नियुकित की
अधिसूचना शीघ्र कार्मिक विभाग से निर्गत करा दें, ताकि इनकी पदस्थापना के बहाने एन विशेष न्यायधीशों को भी
बदलने का अवसर मिल जाए, जिनकी अदालत में सीबीआर्इ द्वारा लालू प्रसाद के खिलाफ दायर 5 मुकदमों की
सुनवार्इ चल रही है।
श्री लालू प्रसाद के खिलाफ दायर मुकदमों में सीबीआर्इ का रवैया ढुलमुल रहा है। मुझे आशंका है कि
त्ब्2096 में सीबीआर्इ उच्च न्यायालय के समक्ष वास्तविकता रखने में ढिलार्इ बरत सकती है। सीबीआर्इ भारत
सरकार के दबाव में पहले कर्इ बार अभियुक्त लालू प्रसाद की मदद कर चुकी है। फिलहाल तो झारखंड में भी
राष्ट्रपति शासन है और सरकार बनाने की कवायद भी चल रही है। इसके पहले सीबीआर्इ इन मामलों की जांच
से जुड़े रांची में पदस्थापित 4 अधिकारियों को बदल चुकी है, जिनका तबादला उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप से
रुका है। मेरी अपील है कि सीबीआर्इ के वकील पटना उच्च न्यायालय की उपयर्ुक्त टिप्पणी पर गौर करेंगे और
इस मामले में अपना पक्ष सही ढंग से रखेंगे।
पशुपालन घोटाले में श्री लालू प्रसाद के खिलाफ दायर मुकदमों में न्याय होने में पहले ही काफी विलम्ब
हो गया है। ये मुकदमे शासन द्वारा उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर आम जनता की ओर से दायर किए गए हैं।
इनमें न्याय मिलने में हो रहा विलम्ब जनता को न्याय देने से बंचित करने के समान है। कहावत है-ष्श्रनेजपबम
कमसंलमक पे श्रनेजपबम कमदपमकष्ण् पूरी व्यवस्था को जकड़ में लेकर सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों द्वारा गरीब जनता का
हक मार कर अरबों रुपयों का पशुपालन घोटाला करने वाले न्याय प्रक्रिया में ऐसी ही बाधा उत्पन्न करते रहे तो
आम जनता का भरोसा न्याय प्रणाली से उठ जाएगा और जनमानस में धारणा धर कर जाएगी कि प्रभावशाली लोग
व्यवस्था के सभी अंगों को अपने अनुकूल प्रभावित करने में सफल हो रहे हैं।
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